सोमवार, ३० सप्टेंबर, २०१९

गोंडवाना साम्राज्य की वीरांगना रानी दुर्गावती की जीवनी और इतिहास

रानी दुर्गावती का नाम भारत की उन महानतम वीरांगनाओं की सबसे अग्रिम पंक्ति में आता है जिन्होंने  मात्रभूमि और अपने आत्मसम्मान की रक्षा हेतु अपने प्राणों का बलिदान दिया । रानी दुर्गावती कालिंजर के राजा कीरत सिंह  की पुत्री और गोंड राजा दलपत शाह की पत्नी थीं । इनका राज्य क्षेत्र दूर-दूर तक फैला था । रानी दुर्गावती बहुत ही कुशल शासिका थीं इनके शासन काल में प्रजा बहुत सुखी थी और राज्य की ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल चुकी थी । इनके राज्य पर ना केवल अकबर बल्कि मालवा के शासक बाजबहादुर की भी नजर थी । रानी ने अपने जीवन काल में कई युद्ध लड़े और उनमें विजय भी हासिल किया गया।

रानी दुर्गावती का जन्म और बचपन :-

 विरांगना रानी जन्मस्थल (कलिंंजर किला)

रानी दुर्गावती का जन्म चंदेल राजा कीरत राय ( कीर्तिसिंह चंदेल ) के परिवार में कालिंजर के किले में  5 अक्टूबर 1524 में हुआ था । राजा कीरत राय की पुत्री का जन्म दुर्गा अष्टमी के दिन होने के कारण उसका नाम दुर्गावती रखा गया । वर्तमान में कालिंजर उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में आता है । इनके पिता राजा कीरत राय का नाम बड़े ही सम्मान से लिया जाता था इनका सम्बन्ध उस चंदेल राज वंश से था राजा विद्याधर ने महमूद गजनबी को युद्ध में खदेड़ा था और विश्व प्रसिद्ध खजुराहो के कंदारिया महादेव मंदिर  का निर्माण करवाया । रानी दुर्गावती का बचपन उस माहोल में बीता जिस राजवंश ने अपने मान सम्मान के लिये कई लडाइयां लड़ी । रानी दुर्गावती ने इसी कारण बचपन से ही अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा भी प्राप्त की ।

रानी दुर्गावती का विवाह और ससुराल :-


               राजा दलपत शाह

रानी दुर्गावती जब विवाह योग्य हुई तब 1542 में उनका विवाह गोंड राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह के सांथ संपन्न हुआ । दोनों पक्षों की जाती अलग-अलग थीं । राजा संग्राम शाह का राज्य बहुत ही विशाल था उनके राज्य में 52 गढ़ थे और उनका राज्य वर्तमान मंडला, जबलपुर , नरसिंहपुर , होशंगाबाद, भोपाल, सागर, दमोह और वर्तमान छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों तक फैला था । गोंड राजवंश और राजपूतों के इस मेल से शेरशाह सूरी को करार झटका लगा । शेरशाह सूरी ने 1545 को कालिंजर पर हमला कर दिया और बड़ी मुश्किल से कालिंजर के किले को जीतने में सफल भी हो गया परन्तु अचानक हुए बारूद के विस्फोट से वह मारा गया । 1545 में रानी दुर्गावती ने एक पुत्र को जन्म दिया । पुत्र का नाम वीरनारायण रखा गया । 1550 में राजा दलपत शाह की मृत्यु हो गई । इस दुःख भरी घड़ी में रानी को अपने नाबालिग  पुत्र वीर नारायण को राजगद्दी पर बैठा कर स्वयं राजकाज की बागडोर संभालनी पड़ी ।

रानी दुर्गावती और उनका राज्य :


                       सिंगोरगढ़

रानी दुर्गावती की राजधानी  सिंगोरगढ़  थी । वर्तमान में जबलपुर-दमोह मार्ग पर स्थित ग्राम सिंग्रामपुर में रानी दुर्गावती की प्रतिमा  से छः किलोमीटर दूर स्थित सिंगोरगढ़ का किला बना हुआ है । सिंगोरगढ़  के अतिरिक्त मदन  महल का किला और नरसिंहपुर का चौरागढ़ का किला रानी दुर्गावती के राज्य के प्रमुख गढ़ों में से एक थे । रानी का राज्य वर्तमान के जबलपुर, नरसिंहपुर , दमोह, मंडला, होशंगाबाद,  छिंदवाडा और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों तक फैला था । रानी के शासन का मुख्य केंद्र वर्तमान जबलपुर और उसके आस-पास का क्षेत्र था ।  अपने  दो मुख्य सलाहकारों और सेनापतियों  आधार सिंह कायस्थ और मानसिंह  ठाकुर की सहायता से राज्य को सफलता पूर्वक चला  रहीं थीं ।  रानी दुर्गावती ने 1550 से 1564 ईसवी तक सफलतापूर्वक शासन किया । रानी दुर्गावती के शासन काल में प्रजा बहुत सुखी थी और उनका राज्य भी लगातार प्रगति कर रहा था ।रानी दुर्गावती के शासन काल में उनके राज्य की ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल गई । रानी दुर्गावंती ने  अपने शासन काल में कई मंदिर, इमारते और तालाब बनवाये । इनमें सबसे प्रमुख हैं जबलपुर का रानी ताल जो रानी दुर्गावती ने अपने नाम पर बनवाया , उन्होंने अपनी दासी के नाम पर चेरिताल और दीवान आधार सिंह के नाम पर आधार ताल बनवाया । रानी दुर्गावती ने अपने शासन काल में जात-पात से दूर रहकर सभी को समान अधिकार दिए उनके  शासन काल में गोंड , राजपूत और कई  मुस्लिम सेनापति भी मुख्य पदों पर आसीन थे । रानी दुर्गावती ने वल्लभ सम्प्रदाय के स्वामी विट्ठलनाथ का स्वागत किया । रानी दुर्गावती को उनकी कई विशेषताओं के कारण जाना जाता है वे बहुत सुन्दर होने के सांथ-सांथ बहादुर और योग्य शासिका भी थीं । उन्होंने दुनिया को यह बलताया की दुश्मन की आगे शीश झुकाकर अपमान जनक जीवन जीने से अच्छा मृत्यु को वरदान करना है ।

रानी दुर्गावती और बाज  बहादुर की लड़ाई :-

शेर शाह सूरी के कालिंजर के दुर्ग में मरने के बाद मालवा पर सुजात खान का अधिकार हो गया जिसे उसके बेटे बाजबहादुर ने सफलतापूर्वक आगे बढाया । गोंडवाना राज्य की सीमा मालवा को छूती थीं और रानी के राज्य की ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल चुकी थी । मालवा के शासक बाजबहादुर ने रानी को महिला समझकर कमजोर समझा और गोंडवाना पर आक्रमण करने की योजना बनाई । बाजबहादुर इतिहास में रानी रूपमती के प्रेम के लिये जाना जाता है । 1556 में बाजबहादुर ने रानी दुर्गावती पर हमला कर दिया ।  रानी की सेना बड़ी बहादुरी के सांथ लड़ी और बाजबहादुर को युद्ध में हार का सामना करना पड़ा और रानी दुर्गावती की सेना की जीत हुई । युद्ध में बाजबहादुर की सेना को  बहुत नुकसान हुआ । इस विजय के बाद रानी का नाम और प्रसिद्धी और अधिक बढ़ गई ।

रानी दुर्गावती और अकबर की लडाई :-

1562 ईसवी में अकबर ने मालवा पर आक्रमण कर मालवा के सुल्तान  बाजबहादुर को परास्त कर मालवा पर अधिकार कर लिया । अब मुग़ल साम्राज्य की सीमा रानी दुर्गावती के राज्य की  सीमाओं को छूने लगी थीं । वहीँ दूसरी तरफ अकबर के आदेश पर उसके  सेनापति अब्दुल माजिद खान  ने रीवा राज्य पर भी अधिकार कर लिया । अकबर अपने साम्राज्य को और अधिक बढ़ाना चाहता था । इसी कारण वह  गोंडवाना साम्राज्य को हड़पने की योजना बनाने लगा । उसने रानी दुर्गावती को सन्देश भिजवाया कि वह अपने प्रिय सफ़ेद हांथी सरमन और सूबेदार आधार सिंह को मुग़ल दरवार में भेज दे । रानी अकबर के मंसूबों से भली भांति परिचित थी उसने अकबर की बात मानने से साफ इंकार कर दिया और अपनी सेना को युद्ध की तैयारी करने का आदेश दिया । इधर अकबर ने अपने सेनापति आसफ खान को गोंडवाना पर आक्रमण करने का आदेश दे दिया । आसफ खान एक विशाल सेना लेकर रानी पर आक्रमण करने के लिये आगे बढ़ा । रानी दुर्गावारी जानती थीं की उनकी सेना अकबर की सेना के आगे बहुत छोटी है । युद्ध में एक और जहाँ मुगलों की विशाल सेना आधुनिक अस्त्र-शत्र से प्रशिक्षित सेना थी वहीँ रानी दुर्गावती की  सेना छोटी और पुराने परंपरागत हथियार से तैयार थी । उन्होंने अपनी सेना को नरई नाला घाटी की तरफ कूच  करने का आदेश दिया । रानी दुर्गावती के लिये नरई  युद्ध हेतु  सुविधाजनक स्थान था क्यूंकि यह स्थान एक ओर से नर्मदा नदी की विशाल जलधारा से और दूसरी तरफ गौर नदी से घिरा था और नरई के चारो तरफ घने जंगलों से घिरी पहडियाँ थीं । मुग़ल सेना के लिये यह क्षेत्र युद्ध हेतु कठिन था । जैसे ही मुग़ल सेना ने घाटी में प्रवेश किया रानी के सैनिकों ने उस पर धावा बोल दिया । लडाई में रानी की सेना के फौजदार अर्जुन सिंह मारे गये अब रानी ने स्वयं ही पुरुष वेश धारण कर युद्ध का नेतृत्व किया दोनों तरफ से सेनाओं को काफी नुकसान हुआ । शाम होते होते रानी की सेना ने मुग़ल सेना को घाटी से खदेड़ दिया और इस दिन की लड़ाई में रानी दुर्गावती की विजय हुई । रानी रात में ही दुबारा मुग़ल सेना पर हमला उसे भरी नुकसान पहुँचाना चाहती थीं परन्तु उनके सलाहकारों ने उन्हें ऐसा नहीं करने की सलाह दी ।
रानी दुर्गावती का बलिदान :-

अपनी हार से तिलमिलाई मुग़ल सेना के सेनापति आसफ खान ने दूसरे दिन विशाल सेना एकत्र की और बड़ी-बड़ी तोपों के सांथ दुबारा रानी पर हमला बोल दिया । रानी दुर्गावती भी अपने प्रिय सफ़ेद हांथी सरमन पर सवार होकर युद्ध मैदान में उतरीं । रानी के सांथ राजकुमार वीरनारायण भी थे रानी की सेना ने कई बार मुग़ल सेना को पीछे धकेला । कुंवर वीरनारायण के घायल हो जाने से रानी ने उन्हें युद्ध से बाहर सुरक्षित जगह भिजवा दिया । युद्ध के दौरान एक तीर रानी दुर्गावती के कान के पास लगा और दूसरा तीर उनकी गर्दन में लगा । तीर लगने से रानी कुछ समय के लिये अचेत हो गई । जब पुनः रानी को होश आया तब तक मुग़ल सेना हावी हो चुकी थी । रानी के सेनापतियों ने उन्हें युद्ध का मैदान छोड़कर सुरक्षित स्थान पर जाने की सलाह दी परन्तु रानी ने इस सलाह को दर किनार कर दिया । अपने आप को चारो तरफ से घिरता देख रानी ने  अपने शरीर को शत्रू के हाँथ ना लगने देने की सौगंध खाते हुए अपने मान-सम्मान की रक्षा हेतु अपनी तलवार निकाली और स्वयं तलवार  घोपकर अपना बलिदान दे दिया और इसतिहास में वीरंगना रानी सदा - सदा के लिये अमर हो गई । जिस दिन रानी ने अपना बलिदान दिया था वह दिन 24 जून 1564 ईसवी का था । अब प्रतिवर्ष 24 जून को बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है और रानी दुर्गावती को याद किया जाता है ।

रानी दुर्गावती के बलिदान के बाद उनका राज्य :-

रानी दुर्गावती के बलिदान के बाद कुंवर वीर नारायण चौरागढ़ में मुगलों से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए । अब सम्पूर्ण गोंडवाना पर मुगलों का अधिपत्य हो गया । कुछ समय पश्चात राजा संग्राम शाह के छोटे पुत्र ( रानी दुर्गावती के देवर ) और चांदा  गढ़ के राजा चन्द्र शाह को अकबर ने अपने अधीन गोंडवाना का राजा घोषित किया और बदले में अकबर ने गोंडवाना के 10 गढ़ लिये ।

रानी दुर्गावती की समाधि :-

वर्तमान में जबलपुर जिले में जबलपुर और मंडला रोड पर स्थित  बरेला के पास नारिया नाला वह स्थान है जिधर रानी दुर्गावती  वीरगती को प्राप्त हुईं थीं । अब इसी स्थान के पास बरेला में रानी दुर्गावती का  समाधि स्थल है । प्रतिवर्ष 24 जून को रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस पर लोग इस स्थान पर उन्हें श्रध्दा सुमन अर्पित करते हैं ।

रानी दुर्गावती का सम्मान :-

जबलपूर संग्रहालय

रानी दुर्गावती के सम्मान में 1983 में  जबलपुर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय कर दिया गया ।
भारत शासन द्वारा 24 जून 1988 रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस पर एक डाक टिकट जारी कर रानी दुर्गावती को याद किया ।

                    डाक टिकट 

जबलपुर में स्थित संग्रहालय का नाम भी रानी दुर्गावती  के नाम पर रखा गया ।
मंडला जिले के शासकीय महाविद्यालय का नाम भी रानी दुर्गावती के नाम पर ही रखा गया है ।
इसी प्रकार कई जिलों में रानी दुर्गावती की प्रतिमाएं लगाई गई हैं और कई शासकीय इमारतों का नाम भी रानी दुर्गावती के नाम पर रखा गया है ।
धन्य हैं रानी दुर्गावती जिन्होंने अपने स्वाभिमान और देश की रक्षा के लिये अपना बलिदान दिया । अपने इस लेख के माध्यम से हम रानी दुर्गावती और उनके शाहस और बलिदान को शत-शत नमन करतें हैं ।


संकलन : सुशिल म. कुवर

तसवीर : प्रतिरोधी साझा कर सकते हैं

   गोंडवाना साम्राज्य वीरांगना रानी दुर्गावती

मंगळवार, ५ फेब्रुवारी, २०१९

भारत के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी तिलका मांझी

🌷तिलका माँझी 🌷
जन्म :- 11 फ़रवरी, 1750,सुल्तानगंज,बिहार;
शहादत- 1785,भागलपुर)

'भारतीय स्वाधीनता संग्राम' के पहले शहीद थे l इन्होंने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध एक लम्बी लड़ाई छेड़ी थी। संथालोंद्वारा किये गए प्रसिद्ध 'संथाल विद्रोह' का नेतृत्त्व भी तिलका माँझी ने किया था। तिलका माँझी का नाम देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्रामी और शहीद के रूप में लिया जाता है। अंग्रेज़ी शासन की बर्बरता के जघन्य कार्यों के विरुद्ध उन्होंने जोरदार तरीके से आवाज़ उठायी थी। इस वीर स्वतंत्रता सेनानी को 1785 में गिरफ़्तार कर लिया गया और फिर फ़ाँसी दे दी गई।जन्म तथा बाल्यकाल तिलका माँझी का जन्म 11 फरवरी, 1750 को बिहार के सुल्तानगंज में 'तिलकपुर' नामक गाँव में एक संथाल परिवार में हुआथा। इनके पिता का नाम 'सुंदरा मुर्मू' था। तिलका माँझी को 'जाबरा पहाड़िया' केनाम से भी जाना जाता था। बचपन से ही तिलका माँझी जंगली सभ्यता की छाया में धनुष-बाण चलाते और जंगली जानवरों का शिकार करते। कसरत-कुश्ती करना बड़े-बड़े वृक्षों पर चढ़ना-उतरना, बीहड़ जंगलों, नदियों, भयानक जानवरों से छेड़खानी, घाटियों में घूमना आदि उनका रोजमर्रा का काम था। जंगली जीवन ने उन्हें निडर व वीर बना दिया था। [1] अंग्रेज़ी अत्याचार किशोर जीवन से ही अपने परिवार तथा जातिपर उन्होंने अंग्रेज़ी सत्ता का अत्याचार देखा था। अनाचार देखकर उनका रक्त खौल उठता और अंग्रेज़ी सत्ता से टक्कर लेने के लिए उनके मस्तिष्क में विद्रोह की लहर पैदा होती। गरीब आदिवासियों की भूमि, खेती, जंगली वृक्षों पर अंग्रेज़ी शासक अपना अधिकार किये हुए थे। जंगली आदिवासियों के बच्चों, महिलाओं, बूढ़ों को अंग्रेज़ कई प्रकार से प्रताड़ित करते थे। आदिवासियों के पर्वतीय अंचल में पहाड़ी जनजाति का शासन था। वहां पर बसा हुए पर्वतीय सरदार भी अपनी भूमि, खेती की रक्षा के लिए अंग्रेज़ी सरकार से लड़ते थे। पहाड़ों के इर्द-गिर्द बसे हुए जमींदार अंग्रेज़ी सरकार को धन के लालच में खुश किये हुए थे। आदिवासियों और पर्वतीय सरदारों की लड़ाई रह-रहकर अंग्रेज़ी सत्ता से हो जाती थी और पर्वतीय जमींदार वर्ग अंग्रेज़ी सत्ताका खुलकर साथ देता था। विद्रोह अंततः वह दिन भी आ गया, जब तिलका माँझी ने 'बनैचारी जोर' नामक स्थान से अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह शुरू कर दिया। वीर तिलका मांझी के नेतृत्व में आदिवासी वीरों के विद्रोही कदमभागलपुर,सुल्तानगंजतथा दूर-दूर तक जंगली क्षेत्रों की तरफ बढ़ रहे थे।राजमहल की भूमि पर पर्वतीय सरदार अंग्रेज़ी सैनिकों से टक्कर ले रहे थे।स्थिति का जायजा लेकर अंग्रेज़ों ने क्लीव लैंड को मैजिस्ट्रेट नियुक्त कर राजमहल भेजा। क्लीव लैंड अपनी सेना और पुलिस के साथ चारों ओर देख-रेख में जुट गया।हिन्दू-मुस्लिम में फूट डालकर शासन करने वाली ब्रिटिश सत्ता को तिलका माँझी ने ललकारा और विद्रोह शुरू कर दिया।क्लीव लैंड की हत्याजंगल,तराई तथागंगा, ब्रह्मी आदि नदियों की घाटियों में तिलका माँझी अपनी सेना लेकर अंग्रेज़ी सरकार के सैनिक अफसरों के साथ लगातार संघर्ष करते-करते मुंगेर,भागलपुर, संथाल परगना के पर्वतीय इलाकों में छिप-छिप कर लड़ाई लड़ते रहे। क्लीव लैंड एवं सरआयर कूट की सेना के साथ वीर तिलका की कई स्थानों पर जमकर लड़ाई हुई। वेअंग्रेज़ सैनिकों से मुकाबला करते-करते भागलपुर की ओर बढ़ गए। वहीं से उनके सैनिक छिप-छिपकर अंग्रेज़ी सेना पर अस्त्र प्रहार करने लगे। समय पाकर तिलका माँझी एक ताड़ के पेड़ पर चढ़ गए। ठीक उसी समय घोड़े पर सवार क्लीव लैंड उस ओर आया। इसी समय राजमहल के सुपरिटेंडेंट क्लीव लैंड को तिलका माँझी ने13 जनवरी, 1784 को अपने तीरों से मार गिराया। क्लीव लैंड की मृत्यु का समाचार पाकर अंग्रेज़ी सरकार डांवाडोल हो उठी। सत्ताधारियों, सैनिकों और अफसरों में भय का वातावरण छा गया। [1] गिरफ़्तारीएक रात तिलका माँझी और उनके क्रान्तिकारी साथी, जब एक उत्सव में नाच गाने की उमंग में खोए थे, तभी अचानक एक गद्दार सरदार जाउदाह ने संथाली वीरों पर आक्रमण कर दिया। इस अचानक हुएआक्रमण से तिलका माँझी तो बच गये, किन्तु अनेक देश भक्तवीर शहीद हुए। कुछको बन्दी बना लिया गया। तिलका माँझी नेवहां से भागकरसुल्तानगंजके पर्वतीय अंचल में शरण ली।भागलपुर से लेकर सुल्तानगंज व उसके आसपास के पर्वतीय इलाकों में अंग्रेज़ी सेना ने उन्हें पकड़ने के लिए जाल बिछा दिया।वीर तिलका माँझी एवं उनकी सेना को अब पर्वतीय इलाकों में छिप-छिपकर संघर्ष करना कठिन जान पड़ा। अन्न के अभाव में उनकी सेना भूखों मरने लगी। अब तो वीर माँझी और उनके सैनिकों के आगे एक ही युक्ति थी कि छापामार लड़ाई लड़ी जाये। तिलका माँझी के नेतृत्व मेंसंथाल आदिवासियों ने अंग्रेज़ी सेना पर प्रत्यक्ष रूप से धावा बोल दिया। युद्धके दरम्यान तिलका माँझी को अंग्रेज़ी सेना ने घेर लिया। अंग्रेज़ी सत्ता ने इस महान विद्रोही देशभक्त को बन्दी बना लिया।शहादत सन 1785 में एक वट वृक्ष में रस्से से बांधकर तिलका माँझी को फ़ाँसी दे दी गई। तिलका माँझी ऐसे प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने भारतको ग़ुलामी से मुक्त कराने के लिए अंग्रेज़ोंके विरुद्ध सबसे पहले आवाज़ उठाई थी, जो 90 वर्षबाद 1857 में स्वाधीनता संग्राम के रूप में पुनः फूट पड़ी थी। क्रान्तिकारी तिलका माँझी की स्मृति में भागलपुर में कचहरी के निकट, उनकी एकमूर्ति स्थापित की गयी है। तिलका माँझी भारत भूमि के अमर सपूत के रूप में सदा याद किये जाते रहेंगे।

संकलन: सुशिल म कुवर


शनिवार, २६ मे, २०१८

आदिवासी क्रांतिवीर: बाबुराव पुल्लेसूर शेडमाके

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में चंद्रपुर जिले का भी अमूल्य योगदान रहा है। अपने हक की आजादी के लिये चंद्रपुर के माटीपुत्रों ने अपने प्राण हसते हुए न्यौछावर कर दिये और इतिहास में अमर हो गये। उनके नाम, कार्य, बलिदान को भले ही हमारे इतिहासकारों ने कम आंका लेकिन इन वीरों की वीरगति को वे नकार नहीं पाये। न जाने ऐसे कितने ही आदिवासी वीर अपनी जन्मभूमि की लाज को बचाते हुए शहीद हो गये लेकिन इतिहास में उनके नाम भी विरले ही हैं। चंद्रपुर जिले के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर शहिद क्रांतिसुर्य बाबुराव शेडमाके का बलिदान विशेष महत्वपूर्ण है, वे क्रांति की मशाल थे। वीर बाबुराव शेडमाके का जन्म मोलमपल्ली (अहेरी) के श्रीमंत शेडमाके जमीनदारी में 12 मार्च 1833 को हुआ, उनकी माता का नाम जुरजायाल (जुरजाकुंवर) था। बाबुराव को 3 साल की उम्र में गोटूल में डाला गया था जहाँ वे मल्लयुद्ध में, तीरकमठा, तलवार, भाला चलाने में प्रशिक्षित हुए। वे अपने साथियों के साथ जंगल में शिकार पर जाते साथ ही शस्त्र चलाने का अभ्यास भी करते। प्राथमिक शिक्षा के लिए ब्रिटिश एज्युकेशन सेंट्रल इंग्लीश मीडियम रायपूर, (मध्यप्रदेश) से चैथी तक की पढ़ाई को पूर्ण कर वे मोलमपल्ली वापस आ गये। उम्र बढने के साथ ही वे सामाजिक नितीमूल्यों को भी सिख गये थे।
धीरे-धीरे वे अपनी जमीनदारी के गांवो के लोगों से संपर्क करने लगे, जिससे उन्हें सावकार, ठेकेदारों द्वारा सामान्य जनता पर किये गये अत्याचार की जानकारी मिली। साथ ही अंग्रेजों के आने के बाद उनके द्वारा दी गई यातनाओं की भी जानकारी उन्हें मिलने लगी। जिससे उनकी समझ और बढ़ती गई। राजपरिवार से होने के बावजूद उनमें जमीनदारी नहीं बल्कि समाज के प्रति सर्मपण का भाव अधिक था जो समय के साथ और परिपक्व होता गया। उनकी शादी आंध्रप्रदेश के आदिलाबाद जिले के चेन्नुर के मड़ावी राजघराणे की बेटी राजकुंवर से हुई। राजकुंवर भी बाबुराव के काम के प्रति उतनी ही समर्पित थी।
उस समय चांदागढ़ और उसके आस-पास के क्षेत्र में गोंड, परधान, हलबी, नागची, माडीया आदिवासियों की संख्या ज्यादा होने के कारण वैष्णवधर्म, इस्लामी, इसाई धर्म का प्रभाव ज्यादा था। 18 दिसंबर 1854 को चांदागड पर आर.एस. एलिस को जिलाधिकारी नियुक्त किया गया, और अंग्रेजों द्वारा गरिबों पर जुल्म ढाने की शुरूआत हो गई। ख्रिश्चन मिशनरी के द्वारा भोलेभाले आदिवासीयों को विकास के नाम पर उनका धर्म परिवर्तण कराकर उन्हें छला जाता था। साथ ही यह क्षेत्र वनसंपत्ती, खनिज संपदा से भरा हुआ था और अंग्रेजों को अपना कामकाज चलाने के लिये इन संपदाओं की जरूरत थी इसीलिये अंग्रेज आदिवासी की जमीनों पर जबरन कब्जा कर रहे थे, ये बात बाबुराव को कतई पसंद नहीं थी। जमीन का हक आदिवासियों का है और वो उन्हें मिलना ही चाहिए। उनका मानना था कि आदिवासी जिस तरह सामुदायीक जीवन पद्धती एवं सांस्कृतिक जीवन शैली में जीते हैं उन्हें वैसे ही जीना चाहिए, और धर्मांतरण कर अपनी असल पहचान नहीं खोनी चाहिए। इस तरह की चीजों ने उनके मन में विद्रोह की ज्वाला प्रज्व्लित कर दी और मरते दम तक अंग्रेजों के खिलाफ लड़कर अपने लोगों की रक्षा करने का उन्होंने संकल्प लिया। इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए 24 सितंबर 1857 को उन्होंने ‘जंगोम सेना’ की स्थापना की।
अडपल्ली, मोलमपल्ली, घोट और उसके आसपास की जमीनदारी से 400-500 आदिवासी और रोहिलों की एक फौज बनाकर उन्हें विधिवत् शिक्षण दिया और अंग्रेजों के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। अंग्रेजों को सबक सिखाने के लिए उन्होंने चांदागढ़ से सटे राजगढ़ को चुना, राजगढ़ अंग्रेजों के कब्जे में था जिसकी जिम्मेदारी अंग्रेजों ने रामशाह गेडाम को सौपी थी। 7 मार्च 1858 को बाबुराव ने अपने साथियों समेत राजगढ़ पर हमला कर दिया और संपूर्ण राजगढ़ को अपने अधिकार में कर लिया। राजगढ़ का जमींदार रामजी गेडाम भी इस युद्ध में मारा गया, राजगढ़ में हुई हार से कैप्टेन डब्ल्यु. एच. क्रिक्टन परेशान हो गया और राजगढ़ को वापस पाने के लिये 13 मार्च 1858 को कैप्टेन क्रिक्टन ने अपनी फौज को बाबुराव की सेना को पकडने के लिए भेज दिया। राजगढ़ से 4 कि.मी. दुर नांदगांव घोसरी के पास बाबुराव और अंग्रजों के बीच जम कर लड़ाई हुई। कई लोग मारे गये, इस युद्ध में बाबुराव शेडमाके की जीत हुई।
राजगढ़ की लड़ाई के बाद अडपल्ली-घोट के जमीनदार व्यंकटराव राजेश्वर राजगोंड भी बाबुराव के साथ इस विद्रोह में आकर सम्मिलित हुए। जिससे कैप्टेन क्रीक्टन और परेशान हो गया। उसने अपनी फौज को बाबुराव और उसके साथियों के पिछे लगा दिया, बाबुराव सतर्क थे उन्हें अंग्रेजों की गतिविधीयों का अंदाजा था। वे जानते थे कि क्रिक्टन अपनी फौज को उन्हें खोजने के लिये जरूर भेजेगा, इसिलिये वे गढिचुर्ला के पहाड़ पर पूरी तैयारी के साथ रूके हुए थे। अंग्रेजों को खबर मिलते ही 20 मार्च 1518 को सुबह 4:30 बजे फौज ने पूरे पहाड़ को घेर लिया और फायरिंग कर दी। बाबुराव के सतर्क सैनिकों ने प्रतिकार करते हुए उन पर पत्थर बरसाये, इसमें अंग्रेजों के बंदूक की गोलियां खत्म हो गई पर पत्थरों की बारिश नहीं रूकी, कई अंग्रेज बुरी तरह से घायल हो गये और भाग गये। पहाड से निचे उतर कर बाबुराव की जंगोम सेना ने वहा पडी बंदुके, तोफे जप्त कर ली और अनाज के कोठार को आम लोगों के लिए खोल दिया। इस तरह एक बार फिर से बाबुराव और उनके सैनिकों की जीत हुई।
बाबुराव, व्यंकटराव और उनके साथियों के विद्रोह को खत्म करने के लिये परेशान कैप्टेन क्रीक्टन ने फिर से चांदागड़ से अंग्रेजी फौज को भेजा। 19 अप्रैल 1858 को सगणापुर के पास बाबुराव के साथियों और अंग्रेजी फौज में घनघोर युद्ध हुआ जिसमें एक बार फिर अंग्रेजी फौज हार गई। इसके फलस्वरूप बबुराव ने 29 अप्रैल 1858 को अहेरी जमीनदारी के चिचगुडी की अंग्रेजी छावणी में हमला कर दिया। कई अंग्रेजी सैनिक घायल हुए वहीं टेलिग्राम ऑपरेटर गार्टलड और हॉल मारे गये। इनका एक साथी पीटर वहां से भागने में कामयाब हो गया उसने कैप्टेन क्रीक्टन को जाकर सारा हवाला दिया। इस हमले के बाद अंग्रेजी फौज में बाबुराव और व्यंकटराव की दहशत बन गई। उन्हें पकडने की अंग्रेजो की सारी योजनाएं विफल हो रही थी, दो-दो टेलिग्राम ऑपरेटर्स की मौत से कैप्टेन क्रिक्टन आग बबूला हो गया था। इस घटना की जानकारी इंग्लैंड की रानी विक्टोरिया को मिलते ही उसने बाबुराव को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का फरमान जारी किया और बाबुराव शेडमाके को पकडने के लिये नागपुर के कैप्टेन शेक्सपियर को नियुक्त किया।
कैप्टेन शेक्सपियर ने वीर बाबुराव शेडमाके को पकडने के लिए उनकी बुआ रानी लक्ष्मीबाई जो अहेरी की जमीनदार थी उन्हें अपना माध्यम बनाया और बदले में बाबुराव शेडमाके की जमीनदारी के 24 गांव, और व्यंकटराव राजेश्वर गोंड की जमीनदारी के 67 गांव याने कुल 91 गांव भेट (इनाम) देने का लालच दिया । साथ ही मना करने पर अहेरी की जमीनदारी जप्त करने की धमकी भी दी। रानी लक्ष्मीबाई लालच में आ गई और बाबुराव को पकडने के लिए अंग्रेजों से मिल गई। बाबुराव इस बात से बेखबर थे। बाबुराव अपने साथियों के साथ घोट गांव में पेरसापेन पुजा में आये हुए थे, ये खबर लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों तक पहुंचाई और वे बाबुराव को पकडने के लिए घोट के पास पहुंचे। बाबुराव और अंग्रेजी फौज के बीच में घमासान युद्ध हुआ और एक बार फिर अंग्रेजी फौज उन्हें पकडने में नाकामयाब रही, और बाबुराव वहां से सही सलामत निकल गये। इस हार के बाद शेक्सपियर बौखला गया उसने घोट की जमीनदारी पर कब्जा कर लिया। इधर अचानक से हुए युद्ध में बाबुराव के कई साथी मारे गये, साथ ही आम लोग भी इसकी चपेट में आ गये। बाबुराव के आंदोलन में कई अड़चने आने लगी। उनके और उनके साथियों की जमीने, जमीनदारी जप्त कर ली गई। व्यंकटराव जंगल में छिप गये जंगोम सेना बिखरने लगी, और बाबुराव अकेले पड़ गये।
घोट में हुई हार के बाद अंग्रेजों ने रानी लक्ष्मीबाई पर और दबाव बनाया। लक्ष्मीबाई को बाबुराव के अकेले पड़ने की खबर मिलते ही उसने बाबुराव को पकड़ने के लिए रोहिलों की सेना को भोपालपटनम भेज दिया, बाबुराव वहा कुछ दिन के लिये रूके हुए थे। रात को निंद में रोहिलों ने उन्हें पकड़ लिया उस वक्त बाबुराव ने उन्हें विरोध न करते हुंए उन्हे अपने काम के उद्देश्य को समझाया। और सही समय देखकर चुपके से वहा से निकल गये। बाबुराव लक्ष्मीबाई की सेना से बच निकलने की खबर कैप्टेन को मिलते ही वो झल्ला गया। बाबुराव अहेरी आ गये। इसकी जानकारी रानी लक्ष्मीबाई को मिलते ही उसने बाबुराव को अपने घर पर खाने का निमंत्रण दिया। वे निमंत्रण स्वीकार कर लक्ष्मीबाई के घर पहुंचे इसकी खबर लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों तक पहुंचा दी। खाना खाते समय अंग्रेजों ने लक्ष्मीबाई के घर को घेरा डाल दिया और बाबुराव को बंदी बना लिया। बाबुराव को अंग्रेजों ने पकड़ लिया है ये बात व्यंकटराव तक पहुंची और वे बस्तर चले गये। बाबुराव की गिरफ्तारी के बाद उनके अन्य साथियों को भी पकड़ लिया गया। बाबुराव और उनके साथियों पर क्रिक्टन की अदालत में गार्टलड और हॉल की हत्या एवं अंग्रेज सरकार के खिलाफ कारवाई करने का मुकदमा चलाया गया। उन्होंने अपने फैसले में बाबुराव को फांसी और उनके साथीयों को 14 वर्ष कारावास का दण्ड सुनाया। 21 अक्टूबर 1858 को बाबुराव को फांसी की सजा सुनाई गई, 21 तारीख को शाम 4 बजे चांदागढ़ राजमहल, जिसको जेल में परिवर्तित कर दिया गया था, वहां के पीपल के पेड़ पर उन्हें फासी दी गई। उस वक्त कैप्टेन क्रिक्टन उनके दायी ओर और कैप्टेन शेक्सपिसर बायी ओर खड़े थे। बंदुकों की सलामी के साथ दोनो कैप्टेन्स ने भी सलामी दी। मृत्यु की जांच पडताल के बाद उन्हें जेल के परिसर में मिट्टी दी गई। जिस पीपल के पेड़ पर वीर बाबुराव को फांसी दी गई वो पेड़ आज भी चंद्रपुर की जेल में ऐतिहासिक विरासत के रूप में खड़ा है। हर साल 21 अक्टूबर को सारी जनता, समाज पीपल के पेड़ के पास एकत्रित होकर वीर बाबुराव को सम्मानपूर्व श्रद्धांजली अर्पित करते हैं।
वीर बाबुराव शेडमाके के बारे में एक आश्चर्यकारक घटना का जिक्र हमेशा कहने सुनने में आता रहा है कि उन्होंने एक बार ताडोबा के जंगल में बांस का फल जिसे ‘ताडवा’ कहा जाता है उसका सेवन कर लिया था वो फल बहुत जहरिला होता है और जो व्यक्ति उसे पाचन कर लेता है उसका शरीर वज्रदेही हो जाता है। बाबुराव ने उसे प्राशन कर लिया था जिससे वे बेहोश हो गये थे लेकिन कुछ देर बाद उन्हें होश आ गया और उसके बाद उनके शरीर पर किसी भी वार का कोई असर नहीं हो रहा था उनमें एक अद्भूत शक्ति आ गयी थी। वे मीलों तक बिना थके तेजी से भाग सकते थे। लक्ष्मीबाई के घर जब अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ा तो प्रतिकार करने हेतु उन्होंने पानी पीने वाले लोटे से कई सैनिकों को घायल कर दिया जिसमें एक की मौत हो गई। जेल में जब उन्हें फांसी दी गयी तो उनका शरीर पत्थर कि तरह था और गर्दन भी सख्त हो गई थी, जिससे फांसी की रस्सी खुल गई। उन्हें फिर से फांसी पर लटकाया गया लेकिन फिर रस्सी खुल गई। ऐसा तीन बार हुआ चैथी बार फांसी होने के बाद उनकी मौत की पुष्टी की गई लेकिन अंग्रेजों में उनका इतना खौफ था कि मौत की पुष्टी करने के लिए उन्होंने बाबुराव शेडमाके के पार्थिव को खौलती चुना भट्टी में डाल दिया। इस घटना का जिक्र महाराष्ट्र की चांदा डिस्ट्रीक गैज़ेटीर्स में भी है उसमें लिखा गया है कि:-
““This rising in Chandrapur was spontaneous. It practically speared towards the end of the great Revolt. Though un-successful it stands out as a brilliant attempt of the Raj Gond Zamindars to regain their freedom. Many folk tales and songs are current in the Chandrapur area extolling the heroic exploits of the two Gond leaders. Baburao the Zamindar of Molampalli. According to one story had consumed tadava, and as a result of its extraordinary powers, when hanged, managed to break the noose four times. He was finally immersed in quick lime, and killed.”
बाबुराव की फांसी के बाद उनके साथी व्यंकटराव को भी 2 साल बाद अंग्रेजों ने पकड़ लिया और उनपर मुकदमा चलाकर 30 मई 1860 को उन्हें भी आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। बाबुराव को गिरफ्तार कराने वाली लक्ष्मीबाई को बाबुराव और व्यंकटराव की जमीनदारी इनाम में दी गई। जिस जमीनदारी के लालच में लक्ष्मीबाई ने बाबुराव को पकडवाया था उनकी जमींदारी भी सन 1951 में समाप्त कर दि गई। और लक्ष्मीबाई ने जो देशद्रोह कर चंद्रपुर जिले को कलंकित किया था उसके लिए उनकी निंदा की गई।
इस तरह 25 साल की कम उम्र में बाबुराव शेडमाके अपने शौर्य का प्रतिक दिखाते हुए स्वतंत्रता की खातिर बलिदान हो गये। उनके शौर्य और साहस के लिए भारत सरकार ने भारतीय डाक द्वारा 12 मार्च सन 2007 को उनके जन्मदिवस पर उनके नाम का एक स्टॅम्प (टिकीट) जारी किया। ऐसे महान वीर सपुत की याद में चंद्रपुर में उनका एक स्मारक बनाने का प्रयास हमारा आदिवासी समाज कई वर्षों से कर रहा है लेकिन सरकार इस पर आजतक मौन हैं। चांदागढ़ के ऐतिहासिक किले की हालत खस्ता हो रही है इस पर भी शासन मौन है सिर्फ पुरातत्व विभाग का बोर्ड लगा देने से किले की हिफाजत नहीं हो सकती उसकी मरम्मत भी की जानी चाहिए। हर साल वीर बाबुराव शेडमाके बलिदान दिवस पर हजारों की संख्या में आदिवासी सगाजन चंद्रपुर जेल में पीपल के पेड़ के पास एकत्रित होकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। गोंड राजाओं की धरती पर आज उनका अपना कोई नामोनिशान नहीं रह गया हैं, जो हैं वो भी ध्वस्त होने की कगार पर हैं। इसे बचाने के लिये सारे समाज को एकजुट होकर साहस के साथ इस समस्या का समाधान करने की जरूरत हैं वो ही हमारे शहिदों के लिये खरी श्रद्धांजली साबित होगी।

सन्दर्भ:
– 1857 चे स्वाधीनता शहीद वीर बाबुराव पुल्लेसुर बापू राजगोंड – पुरूषोत्तम सेडमाके
– भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम में चंद्रपुर – भगवती प्रसाद मिश्र, स्वातंत्र्य संग्राम सेनानी
– आदिवासी संस्कृति, त्यांच्या पुर्वजांचे कार्य व आता नवी दिशा – मधुकर उ. मडावी
– क्रांतीरत्न शहीद वीर बाबुराव पुलेसूरबापू राजगोंड – धिरज सेडमाके 
– गोंडवानाचा सांस्कृतिक इतिहास – शेषराव एन. मंडावी

संकलित: सुशिल.म.कुवर 

आदिवासियों का महानायक: बिरसा मुंडा

झारखंड के आदिवासी दम्पति सुगना और करमी के घर 15 नवंबर 1875 को जन्मे बिरसा मुंडा ने सेहस की स्याही से पुरुषार्थ के पृष्ठों पर शौर्य की शब्दावली रची। उन्होंने हिन्दू धर्म और ईसाई धर्म का बारीकी से अध्ययन किया तथा इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आदिवासी समाज मिशनरियों से तो भ्रमित है ही हिन्दू धर्म को भी ठीक से न तो समझ पा रहा है, न ग्रहण कर पा रहा है। 

बिरसा मुंडा ने महसूस किया कि आचरण के धरातल पर आदिवासी समाज अंधविश्वासों की आंधियों में तिनके-सा उड़ रहा है तथा आस्था के मामले में भटका हुआ है। उन्होंने यह भी अनुभव किया कि सामाजिक कुरीतियों के कोहरे ने आदिवासी समाज को ज्ञान के प्रकाश से वंचित कर दिया है। धर्म के बिंदु पर आदिवासी कभी मिशनरियों के प्रलोभन में आ जाते हैं, तो कभी ढकोसलों को ही ईश्वर मान लेते हैं। 

भारतीय जमींदारों और जागीरदारों तथा ब्रिटिश शासकों के शोषण की भट्टी में आदिवासी समाज झुलस रहा था। बिरसा मुंडा ने आदिवासियों को शोषण की नाटकीय यातना से मुक्ति दिलाने के लिए उन्हें तीन स्तरों पर संगठित करना आवश्यक समझा। पहला तो सामाजिक स्तर पर ताकि आदिवासी-समाज अंधविश्वासों और ढकोसलों के चंगुल से छूट कर पाखंड के पिंजरे से बाहर आ सके। इसके लिए उन्होंने ने आदिवासियों को स्वच्छता का संस्कार सिखाया। शिक्षा का महत्व समझाया। सहयोग और सरकार का रास्ता दिखाया। 

सामाजिक स्तर पर आदिवासियों के इस जागरण से जमींदार-जागीरदार और तत्कालीन ब्रिटिश शासन तो बौखलाया ही, पाखंडी झाड़-फूंक करने वालों की दुकानदारी भी ठप हो गई। ये सब बिरसा मुंडा के खिलाफ हो गए। उन्होंने बिरसा को साजिश रचकर फंसाने की काली करतूतें प्रारंभ की। यह तो था सामाजिक स्तर पर बिरसा का प्रभाव। 

दूसरा था आर्थिक स्तर पर सुधार ताकि आदिवासी समाज को जमींदारों और जागीरदारों क आर्थिक शोषण से मुक्त किया जा सके। बिरसा मुंडा ने जब सामाजिक स्तर पर आदिवासी समाज में चेतना पैदा कर दी तो आर्थिक स्तर पर सारे आदिवासी शोषण के विरुद्ध स्वयं ही संगठित होने लगे। बिरसा मुंडा ने उनके नेतृत्व की कमान संभाली। 



आदिवासियों ने 'बेगारी प्रथा' के विरुद्ध जबर्दस्त आंदोलन किया। परिणामस्वरूप जमींदारों और जागीरदारों के घरों तथा खेतों और वन की भूमि पर कार्य रूक गया। 

तीसरा था राजनीतिक स्तर पर आदिवासियों को संगठित करना। चूंकि उन्होंने सामाजिक और आर्थिक स्तर पर आदिवासियों में चेतना की चिंगारी सुलगा दी थी, अतः राजनीतिक स्तर पर इसे आग बनने में देर नहीं लगी। आदिवासी अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति सजग हुए। 

ब्रिटिश हुकूमत ने इसे खतरे का संकेत समझकर बिरसा मुंडा को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया। वहां अंग्रेजों ने उन्हें धीमा जहर दिया था। जिस कारण वे 9 जून 1900 को शहीद हो गए। 

भारतीय इतिहास में बिरसा मुंडा एक ऐसे नायक थे जिन्होंने भारत के झारखंड में अपने क्रांतिकारी चिंतन से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आदिवासी समाज की दशा और दिशा बदलकर नवीन सामाजिक और राजनीतिक युग का सूत्रपात किया। काले कानूनों को चुनौती देकर बर्बर ब्रिटिश साम्राज्य को सांसत में डाल दिया।

संकलित: सुशिल.म.कुवर 

रानी दुर्गावती

रानी दुर्गावती

(5 अक्टूबर, 1524 – 24 जून, 1564)) भारत की एक वीरांगना थीं जिन्होने अपने विवाह के चार वर्ष बाद अपने पति दलपत शाह की असमय मृत्यु के बाद अपने पुत्र वीरनारायण को सिंहासन पर बैठाकर उसके संरक्षक के रूप में स्वयं शासन करना प्रारंभ किया। इनके शासन में राज्य की बहुत उन्नति हुई। दुर्गावती को तीर तथा बंदूक चलाने का अच्छा अभ्यास था। चीते के शिकार में इनकी विशेष रुचि थी। उनके राज्य का नाम [गोंडवाना] था जिसका केन्द्र जबलपुर था। वे इलाहाबाद के मुगल शासक आसफ खान से लोहा लेने के लिये प्रसिद्ध हैं।

परिचय

महारानी दुर्गावती कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल की एकमात्र संतान थीं। बांदा जिले के कालिंजर किले में 1524 ईसवी की दुर्गाष्टमी पर जन्म के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। नाम के अनुरूप ही तेज, साहस, शौर्य और सुन्दरता के कारण इनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी। दुर्गावती के मायके और ससुराल पक्ष की जाति भिन्न थी लेकिन फिर भी दुर्गावती की प्रसिद्धि से प्रभावित होकर गोण्डवाना साम्राज्य के राजा संग्राम शाह मडावी ने अपने पुत्र दलपत शाह मडावी से विवाह करके, उसे अपनी पुत्रवधू बनाया था।
दुर्भाग्यवश विवाह के चार वर्ष बाद ही राजा दलपतशाह का निधन हो गया। उस समय दुर्गावती की गोद में तीन वर्षीय नारायण ही था। अतः रानी ने स्वयं ही गढ़मंडला का शासन संभाल लिया। उन्होंने अनेक मठ, कुएं, बावड़ी तथा धर्मशालाएं बनवाईं। वर्तमान जबलपुर उनके राज्य का केन्द्र था। उन्होंने अपनी दासी के नाम पर चेरीताल, अपने नाम पर रानीताल तथा अपने विश्वस्त दीवान आधारसिंह के नाम पर आधारताल बनवाया।
रानी दुर्गावती का यह सुखी और सम्पन्न राज्य पर मालवा के मुसलमान शासक बाजबहादुर ने कई बार हमला किया, पर हर बार वह पराजित हुआ। महान मुगल शासक अकबर भी राज्य को जीतकर रानी को अपने हरम में डालना चाहता था। उसने विवाद प्रारम्भ करने हेतु रानी के प्रिय सफेद हाथी (सरमन) और उनके विश्वस्त वजीर आधारसिंह को भेंट के रूप में अपने पास भेजने को कहा। रानी ने यह मांग ठुकरा दी।
इस पर अकबर ने अपने एक रिश्तेदार आसफ खां के नेतृत्व में गोण्डवाना साम्राज्य पर हमला कर दिया। एक बार तो आसफ खां पराजित हुआ, पर अगली बार उसने दुगनी सेना और तैयारी के साथ हमला बोला। दुर्गावती के पास उस समय बहुत कम सैनिक थे। उन्होंने जबलपुर के पास नरई नाले के किनारे मोर्चा लगाया तथा स्वयं पुरुष वेश में युद्ध का नेतृत्व किया। इस युद्ध में 3,000 मुगल सैनिक मारे गये लेकिन रानी की भी अपार क्षति हुई थी।
अगले दिन 24 जून 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला। आज रानी का पक्ष दुर्बल था, अतः रानी ने अपने पुत्र नारायण को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया। तभी एक तीर उनकी भुजा में लगा, रानी ने उसे निकाल फेंका। दूसरे तीर ने उनकी आंख को बेध दिया, रानी ने इसे भी निकाला पर उसकी नोक आंख में ही रह गयी। तभी तीसरा तीर उनकी गर्दन में आकर धंस गया।
रानी ने अंत समय निकट जानकर वजीर आधारसिंह से आग्रह किया कि वह अपनी तलवार से उनकी गर्दन काट दे, पर वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ। अतः रानी अपनी कटार स्वयं ही अपने सीने में भोंककर आत्म बलिदान के पथ पर बढ़ गयीं। महारानी दुर्गावती ने अकबर के सेनापति आसफ़ खान से लड़कर अपनी जान गंवाने से पहले पंद्रह वर्षों तक शासन किया था।
जबलपुर के पास जहां यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ था, उस स्थान का नाम बरेला है, जो मंडला रोड पर स्थित है, वही रानी की समाधि बनी है, जहां गोण्ड जनजाति के लोग जाकर अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। जबलपुर में स्थित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय भी इन्ही रानी के नाम पर बनी हुई है।

संकलित: सुशिल.म.कुवर 

सोमवार, ३१ ऑगस्ट, २०१५

कोण होता 'चेन्दरू मडावी'...?

                 फोटो: चेंदरु मडावी

    विदेशी फिल्म ला ऑस्कर मिळवून देणारा जगातला एकमेव भारतीय आदिवासी मोगली चेन्दरू मडावी...

एक आदिवासी मुलगा वाघासोबत खेळत असल्याचे फोटो अनेकवेळा सोशल मिडीयावर असलेल्या आदिवासी मित्रांच्या वॉल वर पहायला मिळायचे. फोटो पाहिला की असं वाटायचं - असेल एखाद्या चित्रपटातला' म्हणून तो फोटो पाहून झालं कि दुर्लक्ष व्हायचं.

आज भेळ खाता खाता रद्दी झालेल्या एका हिंदी वृत्तपत्रातली बातमी पाहिली. फोटो तोच होता आणि बातमीचे शीर्षक होते - 'दुनिया का असली मोगली. चेन्दरू अब नही रहा.' त्याच क्षणात मनावर मोठा घाव झाल्याचा भास झाला.

प्रवासात असूनही नेमका हा चेन्दरू कोण. याची उत्सुकता मनाला लागून गेली. गुगल मास्तरांच्या वाचनालयात याच चेन्दरू विषयी थोडी शोधाशोध केली तेंव्हा समजले अरे हा चेन्दरू तर जगातला एकमेव मोगली आहे.

भारतातल्या एका आदिवासी गावातला आणि आदिवासी कुटुंबातला लहानसा मुलगा चेन्दरू त्याचा एक मित्र वाघ टेंबू. चेन्दरू आणि टेंबू च्या मैत्रीने पूर्ण प्रांतात नाव लौकिक मिळवला. ह्याच मैत्रीने नंतर जगाची सफर केली!

स्वीडन येथील अर्ने सुक्सडोर्फ या चित्रपट निर्मात्याने टेंबू आणि चंदरूच्या मैत्रीवर चित्रपट काढून ऑस्कर पुरस्कार मिळवला. जगाने अर्ने सुक्सडोर्फ यांना कायम आठवणीत ठेवले. मात्र ज्या चेन्दरूने अर्ने सुक्सडोर्फ यांना जागतिक ओळख दिली त्या चेन्दरूला भारतातच कुणी ओळखत नव्हते. चेन्दरूची आठवण भारतीयांना झाली तेंव्हा मात्र चेन्दरू जग सोडून गेला होता.

जगातली सर्वात मोठ्या आणि महान असलेल्या आदिवासी संस्कृतीत चंदरू चा जन्म झाला होता. डोंगर
दऱ्या आणि नद्यांनी वेढलेल्या बस्तरच्या जंगलांनी त्याचे पालनपोषण केले. जंगल ही आदिवासींची आई आहे तर त्या जंगलात राहणारे सर्वच प्राण्यांना भाऊबंद मानतात. आपल्या दिवसाची सुरुवात त्यांच्याकडून जंगलाची पूजा
करून होते. जंगल आणि आदिवासींच्या या नात्याला ओळख दिली ती बस्तर च्या जंगलातील चेन्दरू याने.

चेन्दरू चे वडील आणि आजोबा खूप चांगले शिकारी होते. शिकारीसाठी रोज जंगलात जावे लागे, असेच एके दिवशी त्यांनी चेन्दरूसाठी एका मोठ्या टोकरीत भेट आणली. चेन्दरूला टोकरी उघडायला लावली. नक्कीच एखाद्या मोठ्या जनावराचे चवदार मटन असणार या उद्देशाने आनंदाच्या भरात चेन्दरूने टोकरी उघडली आणि त्यात त्याला वाघाचं लहानसं गोंडस पिल्लू दिसलं!

चेन्दरूने वाघाचं पिल्लू हातात घेतलं आणि वाघाच्या व माणसाच्या मैत्रीच्या एका अतूट धाग्याची गुंफण तयार झाली. प्राणी आणि मानवाच्या मैत्रीची सुरुवात झाली. चेन्दरू, चेन्दरूची बहिण आणि टेंबू एकत्र एकाच पत्रावळीवर जेवण करायचे.

वाघाने माणूस मारल्याचे अनेक वेळा वाचनात येते, मात्र वाघाने माणसासोबत बसून माणसाच्या पंगतीतले जेवण खाल्ल्याची जगातली ही पहिलीच घटना असावी.

टेंबू मोठा झाला होता त्याच्या खाण्यात वाढ झाली होती. चेन्दरू टेंबूसाठी मोठमोठे मासे मारून आणायचा. टेंबू मोठ्या थाटात ते मासे खायचा.

अश्या या निर्मळ मैत्रीची चर्चा कशी कुणास ठाऊक साता समुद्रापार गेली. एक दिवस बस्तरच्या या जंगलात चेन्दरूच्या घरासमोर गोऱ्या लोकांच्या गाडयांचा ताफा येऊन थांबला. मोठमोठ्या मशीन, कॅमेरा घेऊन आलेल्या. लोकांनी चेन्दरूला घेऊन चित्रपटाचे शूटिंग सुरु केले. चित्रपटाचे नाव होते 'दि जंगल सागा'.

बस्तरच्या जंगलातील आदिवासींना घेऊन चित्रित केलेल्या या चित्रपटाने जगभरात धुमधडाका करून टाकला होता. जगभरात चेन्दरू हिरो झाला होता. त्याला बघायला लोक उतावळे झाले होते.

भारतात मात्र या गोष्टीची गंधवार्ता देखील नव्हती. चित्रपटात २ रुपये रोजाने काम करणारा चेन्दरू सुपरस्टार झाला होता. बस्तरच्या जंगलातील माडिया गोंड या आदिवासी जमातीचा हिरो चेन्दरू मडावी.

जगभर लोकांनी या फिल्म ला डोक्यावर घेतले होते आता लोकांना या फिल्म मधील हिरो ला भेटायचे होते, जवळून अनुभवायचे होते. लोकांच्या आग्रहास्तव अर्ने सुक्सडोर्फ यांनी चेन्दरूला स्वीडनला नेले. स्वीडनला तिथे काळा हिरो म्हणून संबोधले गेले.

चेन्दरू एक वर्षभर अर्ने सुक्सडोर्फ यांच्या घरी राहिला. वर्षभर स्वीडन च्या लोकांनी चेन्दरूला पाहिले आणि चेन्दरूने स्वीडनचे दर्शन केले. चित्रपट आणि दिग्दर्शक चेन्दरूच्या छायेत श्रीमंत झाले होते मात्र चेन्दरू तसाच रिकाम्या हाताने मायभूमीत परत आला. चित्रपटाच्या लोकप्रियतेचा एक टेंबू काही दिवसातच जग सोडून गेला.

चेन्दरूने बस्तर च्या आदिवासी परंपरेनुसार आयुष्याच्या मार्गावरचा जोडीदार गोटुल मध्ये निवडून लग्न केले. स्वप्नाच्या दुनियेतून चेन्दरू बाहेर आला होता आता त्याला पोटाची खळगी भरायला धडपड करावी लागत होती. संघर्ष करावा लागत होता.

चेन्दरू आयुष्याच्या शेवटच्या क्षणापर्यंत कच्च्या कुडाच्या घरात राहिला. जगात हिरो ठरलेल्या चेन्दरूचा 'दि जंगल सागा' हा चित्रपट ४० वर्षांनंतर बस्तरच्या आदिवासींनी पाहिला.

चेन्दरूच्या बायकोला अजूनही पटत नाही की आपला नवरा कधी सुपरस्टार होता. ४० वर्षानंतर गावातील व परिसरातील लोकांनी हा चित्रपट पहिला, मात्र चेन्दरू ने तो चित्रपट पाहिला नाही. त्यावेळी चेन्दरू जुन्या आठवणीत गरीबीचे ओझे पाठीवर घेऊन अंधारात रडत बसला होता.

माणसाच्या आणि प्राण्याच्या मैत्रीचा आदर्श नमुना ठरलेला आणि चित्रपटाच्या माध्यमातून जगभर पोहचलेल्या चेन्दरूला आजारपणात उपचारासाठी न्यायला देखील पैसे राहिले नाहीत. शेवटी १८ सप्टेंबर २०१३ ला या आदिवासी सुपरस्टार आणि जगातल्या एकमेव मोगलीने जगाचा निरोप घेतला.

कुणी आपला शेवटचा श्वास घेतला तर त्याच्यासाठी श्रद्धांजली वाहणाऱ्या लोकांची स्पर्धा लागते मात्र ६० वर्षांपूर्वी वाघाच्या आणि माणसाच्या मैत्रीचा संदेश जगाला देणाऱ्या चेन्दरू बद्दल कुणी साधा एक शब्दही काढला नाही की कुणाला सार्वजनिक श्रद्धांजली वाहण्याची गरजही वाटली नाही.

प्रसिद्धी मिळवून देखील दारिद्र्याने त्याची पाठ सोडली नाही. करोडो डॉलर आणि शेकडो पुरस्कार मिळवणाऱ्या चित्रपटाचा हिरो शेवटी उपाशीपोटी जग सोडून गेला...!!!

संकलन: सुशिल म कुवर
मो. 7507084152